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मंगलवार, 29 नवंबर 2016

अंडे का फंडा : प्रोटीन या जहर ! कंही आप तो नहीं खाते ?

सब जानते हैं कि मांसाहार का व्यवसाय क्रूरता और हिंसा पर टिका है। लेकिन जब बात अण्डों की होती है तो कई बार वह क्रूरता और व्यवसायिक हिंसा पर्दे की ओट में छिप जाती है और कुछ लोग अंडे को शाकाहारी बताने के प्रचार को सच मान बैठते हैं।

(अंडा किसी भी तरह शाकाहारी नहीं होता )

अंडे दो तरह के होते है, एक वे जिसमें से चूजे निकल सकते है तथा दूसरे वे जिनसे बच्चे नहीं निकलते। निषेचित और अनिषेचित। मुर्गे के संसर्ग से
मुर्गी अंडे दे सकती है किन्तु बिना संसर्ग के अंडा मात्र मुर्गी के रज-स्राव से बनता है, मासिक-धर्म की भांति ही यह अंडा मुर्गी की आन्तरिक अपशिष्ट का परिणाम होता है। आजकल इन्ही अंडो को व्यापारिक स्वार्थवश लोग अहिंसक, शाकाहारी आदि भ्रामक नामों से पुकारते है। यह अंडे किसी भी तरह से वनस्पति नहीं है।और न ही यह शाक की तरह, सौर किरणें, जल व वायु से अपना भोजन बनाकर उत्पन्न होते है। अधिक से अधिक इसे मुर्गी का अपरिपक्व मूर्दा भ्रूण कह सकते है।
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1962 मॆं यूनिसेफ ने एक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें अंडों को लोकप्रिय बनाने के व्यवसायिक उद्देश्य से अनिषेचित (INFERTILE) अंडों को शाकाहारी अंडे (VEGETARIAN EGG) जैसा मिथ्या नाम देकर भारत के शाकाहारी समाज में भ्रम फैला दिया। 1971 में मिशिगन यूनिवर्सिटी(अमेरिका) के वैज्ञानिक डॉ0 फिलिप जे0 स्केम्बेल ने 'पॉलट्री फीड्स एंड न्युट्रीन' नामक पुस्तक में यह सिद्ध किया कि "संसार का कोई भी अंडा निर्जीव नहीं होता, फिर चाहे वह निषेचित (सेने योग्य) हो या अनिषेचित, अनिषेचित अंडे में भी जीवन होता है, वह एक स्वतंत्र जीव होता है। अंडे के ऊपरी भाग पर हजारो सूक्ष्म छिद्र होते है जिनमे अनिषेचित अंडे का जीव श्वास लेता है", जब तक श्वासोच्छवास की क्रिया होती है, अंडा सडन-गलन से मुक्त रहता है। यह उसमें जीवन होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है। "यदि ऐसे अंडे में श्वासोच्छवास की क्रिया बंद हो जाए तो अंडा शीघ्र ही सड जाता है।" इसतरह अंडे को निर्जीव और शाकाहार समकक्ष मनवाना बहुत बडी धूर्तता है, यह मात्र उत्पादकों के व्यापारिक स्वार्थ के खातिर प्रचारित भ्रांति से अधिक कुछ भी नहीं है।

हिंसा और अत्याचार की उपज है अंडा !!

बहुधा यह सुनने में आता है की अनिषेचित अंडे अहिंसक होते है। लेकिन यदि यह मालूम हो जाय कि उनके उत्पादन की विधि कितनी क्रूरता से परिपूर्ण है और भारतीय मूल्यों जैसे अहिंसा और करुणा के विपरीत है तो बहुत से लोग अंडा सेवन ही बंद कर देगे। अमेरिका के विश्वविख्यात लेखक जान राबिन्स ने अपनी प्रसिद्द पुस्तक "दैट फार ए न्यू अमेरिका" में लिखा है कि अंडों की फेक्ट्रीयो में स्थापित पिजरों में, इतनी अधिक मुर्गियां भर दी जाती है कि वे पंख भी नहीं फडफड़ा सकती और तंग जगह के कारण वे आपस में चोचे मारती है, जख्मी होती है, गुस्सा करती है और कष्ट भोगती है। मुर्गी को लगातार २४ घंटे लोहे की सलाख पर बैठे रहना पड़ता है, उसी हालात में एक विशेष मशीन से रात में एक साथ हजारो मुर्गियों की चोचे काट दी जाती है। गरम तपते लाल औजारों से उनके पंख भी कतर दिए जाते है।

मुर्गियां अंडे अपनी स्वेच्छा से नहीं देती, बल्कि उन्हें विशिष्ट हार्मोन्स और एग-फर्म्युलेशन के इन्जेक्शन दिए जाते है। तब जाकर मुर्गीयाँ लगातार अंडे दे पाती है। अंडे प्राप्त होते ही उन्हें इन्क्यूबेटर के हवाले कर दिया जाता है, ताकि चूजा २१ दिन की बज़ाय मात्र १८ दिन में ही निकल आए। बाहर आते ही नर तथा मादा चूजों को अलग-अलग कर दिया जाता है। मादा चूजों को शीघ्र जवान करने के लिए, उन्हें विशेष प्रकार की खुराक दी जाती है। साथ ही इन्हें चौबीसो घंटे तेज प्रकाश में रखकर, सोने नहीं दिया जाता ताकि वे रात दिन खा-खा कर शीघ्र रज-स्राव कर अंडा देने लायक हो जाय। उसके बाद भी उन्हें लगातार तेज रोशनी में रखा जाता है ताकि खाती रहे और प्रतिदिन अंडा देती रहे।तंग जगह में रखा जाता है कि हिलडुल भी न सके,और अंडे को क्षति न पहुँचे। आप समझ सकते है की जल्दी और मशीनीकृत तरीके से अंडा उत्पन्न करने की यह व्यवस्था कितनी क्रूर और हिंसात्मक है्।

अंडो से कई बीमारियाँ :- 

हाल ही में हुआ बर्ड फ्ल्यू और साल्मानोला बीमारी ने समस्त विश्व को स्तम्भित कर दिया है कि मुर्गियों को होने वाली कई बीमारियों के कारण अन्डो से यह बीमारियाँ, मनुष्य में भी प्रवेश करती है। अंडा भोजियों को यह भी नहीं मालूम कि इसमें हानिकारक कोलेस्ट्राल की बहुत अधिक मात्रा होती है। अंडो के सेवन से आंतो में सड़न और तपेदिक की सम्भावनाएँ बहुत ही बढ़ जाती है। अंडे की सफ़ेद जर्दी से पेप्सीन इन्जाइम के विरुद्ध, विपरित प्रतिक्रिया होती है।


जर्मनी के प्रोफेसर एग्नरबर्ग का मानना है कि अंडा 51.83% कफ पैदा करता है। वह शरीर के पोषक तत्वों को असंतुलित कर देता है।

कैथराइन निम्मो तथा डाक्टर जे एम् विलिकाज ने एक सम्मिलित रिपोर्ट में कहा है कि अंडा ह्रदय रोग और लकवे आदि के लिए एक जिम्मेदार कारक है। यह बात १९८५ इस्वी के नोबल पुरस्कार विजेता, डॉक्टर ब्राउन और डॉ0 गोल्ड स्टाइन ने कही कि अंडों में सबसे अधिक कोलेस्ट्रोल होता है। जिससे उत्पन्न ह्रदय रोग के कारण बहुत अधिक मौते होती है। इंग्लेंड के डाक्टर आर जे विलियम ने कहा है कि जो लोग आज अंडा खाकर स्वस्थ बने रहने की कल्पना कर रहे है, वे कल लकवा, एग्जिमा, एन्जाईना जैसे रोगों के शिकार हो सकते है। फिर अंडे में जरा सा भी फाईबर नहीं होता, जो आंतो में सड़न की रोकथाम में सहायक है। साथ ही कार्बोहाईड्रेट जो शरीर में स्फूर्ति देता है, करीबन शून्य ही होता है।
जाने-माने हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. के.के. अग्रवाल का कहना है कि एक अंडे में 213 मिलीग्राम कॉलेस्ट्रॉल होता है यानी आठ से नौ चम्मच मक्खन के बराबर, क्योंकि एक चम्मच मक्खन में 25 मिलीग्राम कॉलेस्ट्रॉल होता है। इसलिए सिर्फ शुगर, हाई बीपी और हार्ट पेशेंट्स को ही इन्हें दूर से सलाम नहीं करना चाहिए बल्कि सामान्य सेहत वाले लोगों को भी दूर रहना चाहिए। अगर डॉक्टर प्रोटीन की जरूरत भी बताये तो प्रोटीन की प्रतिपूर्ति, शाकाहारी माध्यमों - मूँगफली, सोयाबीन, दालें, पनीर, दूध व मेवे आदि से करना अधिक आरोग्यप्रद है।
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इग्लेंड के डॉ0 आर0 जे0 विलियम का निष्कर्ष है कि सम्भव है अंडा खाने वाले भले शुरू में क्षणिक आवेशात्मक चुस्ती-फुर्ती अनुभव करें किंतु बाद में उन्हें हृदय रोग, एक्ज़ीमा, लकवा, जैसे भयानक रोगों का शिकार होना पड़ सकता है।
इंगलैंड के मशहूर चिकित्सक डॉ0 राबर्ट ग्रास तथा प्रो0 ओकासा डेविडसन इरविंग के अनुसार अंडे खाने से पेचिश तथा मंदाग्नि जैसी बिमारियों की प्रबल सम्भावनाएं होती है। जर्मनी के प्रो0 एग्लर वर्ग का निष्कर्ष है कि अंडा 51.83 प्रतिशत कफ पैदा करता है, जो शरीर के पोषक तत्वों को असंतुलित करने में मुख्य घटक है। फ्लोरिडा के कृषि विभाग की हेल्थ बुलेटिन के अनुसार, अंडों में 30 प्रतिशत DDT पाया जाता है । जिस प्रकार पॉल्ट्रीज को रखा जाता है, उस प्रक्रिया के कारण DDT मुर्गी की आंतों में घुल जाता है अंडे के खोल में 15000 सूक्ष्म छिद्र होते हैं जो सूक्ष्मदर्शी यन्त्र द्वारा आसानी से देखे जा सकते हैं उन छिद्रों द्वारा DDT का विष अंडों के माध्यम से मानव शरीर में पहुंच जाता है। जो कैंसर की सम्भावनाएँ कईं गुना बढ़ा देता है। हाल ही में इंगलैंड के डॉक्टरों ने सचेत किया है कि ‘सालमोनेला एन्टरईटिस’, जिसका सीधा संबन्ध अंडों से है, के कारण लाखों लोग इंगलैंड में एक जहरीली महामारी का शिकार हो रहे है। भारत में ऐसी कोई परीक्षण विधि नहीं है कि सड़े अंडों की पहचान की जा सके। और ऐसे सड़े अंडों के सेवन से उत्पन्न होने वाले, भयंकर रोगों की रोकथाम सम्भव हो सके।

पौष्टिकता एवं उर्जा के प्रचार में नहीं है दम :-

विज्ञापनों के माध्यम से यह भ्रम बड़ी तेजी से फैलाया जा रहा है कि शाकाहारी खाद्यानो की तुलना में, अंडे में अधिक प्रोटीन है। जबकि विश्व स्वास्थ्य संघठन के तुलनात्मक चार्ट से यह बात साफ है कि खनिज, लवण, प्रोटीन, कैलोरी, रेशे और कर्बोहाड्रेड आदि की दृष्टि से शाकाहार ही हमारे लिए अधिक उपयुक्त, पोषक और श्रेष्ठ है।

अंडे से कार्य-क्षमता, केवल क्षणिक तौर पर बढ़ती सी प्रतीत होती है, पर स्टेमिना नहीं बढ़ता। फार्मिंग से आए अंडे तो केमिकल की वजह से ज्यादा ही दूषित या जहरीले हो जाते हैं। सामान्यतया गर्मियों में पाचनतंत्र कमजोर होता है, ऐसे में अंडे ज्यादा कैलरी व गरिष्ठ होने के कारण और भी ज्यादा नुकसानदेय साबित होते हैं।

>>ईस्वर की झोली God's Bag
अमेरिका के डॉ0 ई0 बी0 एमारी तथा इग्लेंड के डॉ0 इन्हा ने अपनी विश्व विख्यात पुस्तकों में साफ माना है कि अंडा मनुष्य के लिये ज़हर है।
विशेषज्ञ कहते हैं कि प्रोटीन के लिए, सभी तरह की दालें, पनीर व दूध से बनी चीजें अंडे का श्रेष्ठ विकल्प होती हैं। अंडों की जगह उनका इस्तेमाल होना चाहिए। दूध या स्किम्ड मिल्क, मूंगफली, मेवे में अखरोट, बादाम, काजू व हरी सब्जियां, दही, सलाद और फल भी ले सकते हैं। उनका कहना है कि जीव-जंतुओं से प्राप्त भोजन से कॉलेस्ट्रॉल अधिक बढ़ता है जबकि पेड़-पौधों से मिलने वाले भोजन से बहुत ही कम।

न हमारे शरीर को अंडे खाना ज़रूरी है और न हमारे मन को जीवहिंसा का सहभागी बनना। हमारा अनुरोध है कि निरामिष (शाकाहारी)  भोजन अपनायें और स्वस्थ रहें।
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शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

कार्तिक पूर्णिमा के महत्व और उपाय लक्ष्मी होगी प्रसन्न!

उपाय:-
  • पूर्णिमा मां लक्ष्मी को अत्यन्त प्रिय है। इस दिन मॉ लक्ष्मी की आराधना करने से जीवन में खुशियों की कमी नहीं रहती है। 
  • पूर्णिमा को प्रातः 5 बजे से 10: 30 मिनट तक मॉ लक्ष्मी का पीपल के वृक्ष पर निवास रहता है।
  • इस दिन जो भी जातक मीठे जल में दूध मिलाकर पीपल के पेड़ पर चढ़ाता है उस पर मां लक्ष्मी प्रसन्न होती है। कार्तिक पूर्णिमा के गरीबों को चावल दान करने से चन्द्र ग्रह शुभ फल देता है।
  • इस शिवलिंग पर कच्चा दूध, शहद व गंगाजल मिलकार चढ़ाने से भगवान शिव प्रसन्न होते है। 
  • कार्तिक पूर्णिमा को घर के मुख्यद्वार पर आम के पत्तों से बनाया हुआ तोरण अवश्य बॉधे। 
  • वैवाहिक व्यक्ति पूर्णिमा के दिन भूलकर भी अपनी पत्नी या अन्य किसी से शारीरिक सम्बन्ध न बनायें वरना चन्द्रमा के दुष्प्रभाव आपको व्यथित करेंगे। 
  • आज के दिन चन्द्रमा के उदय होने के पश्चात खीर में मिश्री व गंगा जल मिलाकर मां लक्ष्मी को भोग लगाकर प्रसाद वितरित करें।
कार्तिक पूर्णिमा का महत्व:- 


  • कार्तिक पूर्णिमा के दिन व्रत, स्नान-दान करने से असीम पुण्य मिलता है। कार्तिक मास की पूर्णिमा का खास महत्व है। 
  • यह त्रिपुरी पूर्णिमा व गंगा स्नान नाम से प्रचलित है। क्योंकि आज के दिन ही भगवान शंकर ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था। इस दिन भगवना शंकर के दर्शन मात्र से ही पूण्य मिलता है।
  • पुराणों के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु ने प्रलय काल में धर्म, वेदों की रक्षा के लिए एंव सृष्टि की रक्षा के लिए मत्स्य अवतार धारण किया था। 
  • अषाढ़ शुक्ल एकादशी से भगवान विष्णु चार मास के लिए योगनिद्रा में लीन होकर कार्तिक एकादशी को पुनः उठते है और पूर्णिमा से संसार के पालन का कार्य करने लगते है। 
  • इसी दिन लक्ष्मी की अंशरूपा तुलसी का विवाह शालिग्राम से हुआ था।

>>कार्तिक पूर्णिमा कब क्या क्यों कैसे ?
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कार्तिक पूर्णिमा कब क्या क्यों कैसे ?

 
  इस 14 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा है, हिंदू धर्म में इस दिन की काफी मान्यता है। इसे कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा या गंगा स्नान के नाम से भी जाना जाता है। इस पुर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा की संज्ञा इसलिए दी गई है क्योंकि इस दिन ही भगवान शंकर ने त्रिपुरासुर नामक महाभयानक असुर का अंत किया था और वे त्रिपुरारी के रूप में पूजित हुए थे।ऐसी मान्यता है कि इस दिन कृतिका में शिव शंकर के दर्शन करने से सात जन्म तक व्यक्ति ज्ञानी और धनवान होता है। इस दिन चन्द्र जब आकाश में उदित हो रहा हो उस समय शिवा, संभूति, संतति,
प्रीति, अनुसूया और क्षमा इन छ: कृतिकाओं का पूजन करने से शिव जी की प्रसन्नता प्राप्त होती है।पूर्णिमा यानि चन्द्रमा की पूर्णअवस्था। पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा ठीक 180 अंश पर होता है। उस दिन चन्द्रमा से जो किरणें निकलती है वह काफी सकारात्मक होती है और वह किरणें सीधे दिमाग पर असर डालती है। चूंकि चन्द्रमा पृथ्वी के सबसे अधिक नजदीक है, इसलिए पृथ्वी पर सबसे ज्यादा प्रभाव चन्द्रमा का ही पड़ता है।जिस कारण पूर्णिमा वाले दिन हर मनुष्य को अपनी मानसिक उर्जा में वृद्धि करने के लिए चन्द्र को अर्घ्य देकर स्तुति करनी चाहिए.


कब :-
14th November 2016 (Monday)
पूर्णिमा प्रारंभ  = 23:17 on 13/Nov/2016
पूर्णिमा अंत  = 19:22 on 14/Nov/2016

>>कार्तिक पूर्णिमा के महत्व और उपाय लक्ष्मी होगी प्रसन्न!
पूरे दिन उपवास:- रखकर एक समय भोजन करना चाहिए इस दिन पूरे दिन उपवास रखकर एक समय भोजन करना चाहिए। अपनी सामर्थ्य अनुसार गाय का दूध, केला, खजूर, नारियल, अमरूद आदि फलों का दान करना चाहिए। ब्राहम्ण, बहन, बुआ आदि को कार्तिक पूर्णिमा के दिन दान करने से अक्षय पुण्य मिलता है। शाम के समय निम्न मन्त्र से वसंतबान्धव विभो शीतांशो स्वस्ति नः कुरू'' चन्द्रमा को अर्घ्य देना चाहिए।

कैसे करें कार्तिक पूर्णिमा में गंगा स्नान:- कार्तिक पूर्णिमा की स्नान के सम्बन्ध में ऋषि अंगिरा ने लिखा है-इस दिन सबसे पहले हाथ-पैर धो लें फिर आचमन करके हाथ में कुशा लेकर स्नान करें। यदि स्नान में कुश और दान करते समय हाथ में जल व जप करते समय संख्या का संकल्प नहीं किया जाये तो कर्म फलों से सम्पूर्ण पुण्य की प्राप्ति नहीं होती है। दान देते समय जातक हाथ में जल लेकर ही दान करें।


क्या करें:- कार्तिक पूर्णिमा के दिन भविष्य पुराण के अनुसार वैशाख, माघ और कार्तिक माह की पूर्णिमा स्नान-दान के लिए श्रेष्ठ मानी गई है। इस पूर्णिमा में जातक को नदी या अपने स्नान करने वाले जल में थोड़ा सा गंगा जल मिलाकर स्नान करना चाहिए तत्पश्चात भगवान विष्णु का विधिवत पूजन व अर्चज करना चाहिए।

कैसे करे :-
  • अगर संभव हो तो इस दिन हर जातक को गंगा स्नान करना चाहिए।
  • स्नान के बाद उसे भगवान विष्णु की पूजा-आरती करनी चाहिए। 
  • इस दिन जातक को उपवास रखना चाहिए या फिर एक समय ही भोजन करना चाहिए।
  • नमक का सेवन ना करें इस दिन और हो सके तो ब्राह्मणों को दान दें और उन्हें भोजन कराएं।
  • शाम के समय निम्न मंत्र से चन्द्रमा को अर्घ्य देना चाहिए
  • "वसंतबान्धव विभो शीतांशो स्वस्ति न: कुरु"


सोमवार, 7 नवंबर 2016

ईस्वर की झोली God's Bag

एक आदमी मर गया. जब उसे महसूस हुआ तो उसने देखा कि भगवान उसके पास आ रहे हैं और उनके हाथ में एक झोली है.
भगवान ने कहा --पुत्र चलो अब समय हो गया.
आश्चर्यचकित होकर आदमी ने जबाव दिया -- अभी इतनी जल्दी? अभी तो मुझे बहुतकाम करने हैं. मैं क्षमा चाहता हूँ किन्तु अभी चलने का समय नहीं है. आपकी  इस झोली में क्या है? उसने पूछा ...
भगवान ने कहा -- तुम्हारा सामान.
मेरा सामान? आपका मतलब है कि मेरी वस्तुएं, मेरे कपडे, मेरा धन?
भगवान ने प्रत्युत्तर में कहा -- ये वस्तुएं तुम्हारी नहीं हैं. ये तो पृथ्वी से सम्बंधित हैं.
आदमी ने पूछा -- मेरी यादें?
भगवान ने जबाव दिया -- वे तो कभी भी तुम्हारी नहीं थीं. वे तो समय की थीं.
फिर तो ये मेरी बुद्धिमत्ता होंगी?
>>आजीवन सुखमय कैसे रहे ? कौवे और मोर की लघु कथा ! Crows and peacocks short story
भगवान ने फिर कहा -- वह तो तुम्हारी कभी भी नहीं थीं. वे तो परिस्थिति जन्य थीं.
तो ये मेरा परिवार और मित्र हैं?
भगवान ने जबाव दिया -- क्षमा करो वे तो कभी भी तुम्हारे नहीं थे. वे तो राह में मिलने वाले पथिक थे.
फिर तो निश्चित ही यह मेरा शरीर होगा?
भगवान ने मुस्कुरा कर कहा -- वह तो कभी भी तुम्हारा नहीं हो सकता क्योंकि वह तो राख है.

तो क्या यह मेरी आत्मा है?
नहीं वह तो मेरी है --- भगवान ने कहा.
भयभीत होकर आदमी ने भगवान के हाथ से झोली ले ली , और उसे खोल दिया यह
देखने के लिए कि झोली में क्या है. वह झोली खाली थी .
आदमी की आँखों में आंसू आ गए और उसने कहा -- मेरे पास कभी भी कुछ नहीं था.
भगवान ने जबाव दिया -- यही सत्य है. प्रत्येक क्षण जो तुमने जिया, वही
तुम्हारा था. जिंदगी क्षणिक है और वे ही क्षण तुम्हारे हैं.
इस कारण जो भी समय आपके पास है, उसे भरपूर जियें. आज में जियें. अपनी जिंदगी जिए.
खुश होना कभी न भूलें, यही एक बात महत्त्व रखती है.
भौतिक वस्तुएं और जिस भी चीज के लिए आप यहाँ लड़ते हैं, मेहनत करते हैं...
आप यहाँ से कुछ भी नहीं ले जा सकते हैं.


ऐसा  कह कर भगवन उसे साथ ले जाने लगे ...
इसीलिए तो कहते है .. 
जिंदगी खुल के जियो , डर-डर के नहीं ...
मंजिले मिल ही जाएँगी , मर-मर के नहीं ...



शनिवार, 5 नवंबर 2016

अध्यात्म क्या है इसके बारे में जाने ? What is Sprituality?

अध्यात्म का अर्थ है अपने भीतर के चेतन तत्व को जानना,मनना और दर्शन करना अर्थात अपने आप के बारे में जानना या आत्मप्रज्ञ होना |गीता के आठवें अध्याय में अपने स्वरुप अर्थात जीवात्मा को अध्यात्म कहा गया है | "परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते "|
आत्मा परमात्मा का अंश है यह तो सर्विविदित है
इस सम्बन्ध में शंका या संशय,अविश्वास की स्थिति अधिक क्रियमान होती है तभी हमारी दूरी बढती जाती
है और हम विभिन्न रूपों से अपने को सफल बनाने का निरर्थक प्रयास करते रहते हैं जिसका परिणाम नाकारात्मक ही होता है |

ये तो असंभव सा जान पड़ता है-मिटटी के बर्तन मिटटी से अलग पहचान बनाने की कोशिश करें तो कोई क्या कहे ? यह विषय विचारणीय है |
अध्यात्म की अनुभूति सभी प्राणियों में सामान रूप से निरंतर होती रहती है | स्वयं की खोज तो सभी कर रहे हैं,परोक्ष व अपरोक्ष रूप से |
परमात्मा के असीम प्रेम की एक बूँद मानव में पायी जाती है जिसके कारण हम उनसे संयुक्त होते हैं किन्तु कुछ समय बाद इसका लोप हो जाता है और हम निराश हो जाते हैं,सांसारिक बन्धनों में आनंद ढूंढते ही रह जाते हैं परन्तु क्षणिक ही ख़ुशी पाते हैं |

बहानाइटीस : कंही आप भी तो बहाने नहीं बनते ? सफलता का राज !


जब हम क्षणिक संबंधों,क्षणिक वस्तुओं को अपना जान कर उससे आनंद मनाते हैं,जब की हर पल साथ रहने वाला शरीर भी हमें अपना ही गुलाम बना देता है | हमारी इन्द्रियां अपने आप से अलग कर देती है यह इतनी सूक्ष्मता से करती है - हमें महसूस भी नहीं होता की हमने यह काम किया है ?

जब हमें सत्य की समझ आती है तो जीवन का अंतिम पड़ाव आ जाता है व पश्चात्ताप के सिवाय कुछ हाथ नहीं लग पाता | ऐसी स्थिति का हमें पहले ही ज्ञान हो जाए तो शायद हम अपने जीवन में पूर्ण आनंद की अनुभूति के अधिकारी बन सकते हैं |हमारा इहलोक तथा परलोक भी सुधर सकता है |
अब प्रश्न उठता है की यह ज्ञान क्या हम अभी प्राप्त कर सकते हैं ? हाँ ! हम अभी जान सकते हैं की अंत समय में किसकी स्मृति होगी, हमारा भाव क्या होगा ? हम फिर अपने भाव में अपेक्षित सुधार कर सकेंगे | गीता के आठवें अध्याय श्लोक संख्या आठ में भी बताया गया है
यंयंवापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् |
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भाव भावितः ||
अर्थात-"हे कुंतीपुत्र अर्जुन ! यह मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, उस-उस को ही प्राप्त होता है ;क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहता है |"
एक संत ने इसे बताते हुए कहा था की सभी अपनी अपनी आखें बंद कर यह स्मरण करें की सुबह अपनी आखें खोलने से पहले हमारी जो चेतना सर्वप्रथम जगती है उस क्षण हमें किसका स्मरण होता है ?

आत्मविश्वास पर अदभुत कविता Self-confidence Bdhaye!


 बस उसी का स्मरण अंत समय में भी होगा | अगर किसी को भगवान् के अतिरिक्त किसी अन्य चीज़ का स्मरण होता है तो अभी से वे अपने को सुधार लें और निश्चित कर लें की हमारी आँखें खुलने से पहले हम अपने चेतन मन में भगवान् का ही स्मरण करेंगे |बस हमारा काम बन जाएगा नहीं तो हम जीती बाज़ी भी हार जायेंगे |

कदाचित अगर किसी की बीमारी के कारण या अन्य कारण से बेहोशी की अवस्था में मृत्यु हो जाती है तो दीनबंधु भगवान् उसके नित्य प्रति किये गए इस छोटे से प्रयास को ध्यान में रखकर उन्हें स्मरण करेंगे और

उनका उद्धार हो जाएगा क्योंकि परमात्मा परम दयालु हैं जो हमारे छोटे से छोटे प्रयास से द्रवीभूत हो जाते हैं |

ये विचार मानव-मात्र के कल्याण के लिए समर्पित है |

सत्यम शिवम् सुन्दरम

 Read More ! कुछ और अच्छा पढना है मुझ पर क्लीक करो !




मंगलवार, 1 नवंबर 2016

आजीवन सुखमय कैसे रहे ? कौवे और मोर की लघु कथा ! Crows and peacocks short story

कृपया यह कहानी बड़े भी जरुर पढ़े ,दोस्तों आज मैं आपको एक बहुत ही विचार पूर्ण कहानी सुनाऊंगा यह कहानी एक कौवे की है यह कौवा एक जंगल में रहता था और उसके पास उसका परिवार था वह बहुत ही खुशी पूर्वक अपना जीवन यापन कर रहा था उसे अपने जीवन में किसी भी तरह की कोई कमी नहीं थीं , किंतु एक दिन वह पानी की तलाश में जंगल से थोड़ा दूर निकल आया वही कुछ दूर पर एक तालाब था जिस में एक हंस तैर रहा था कौवा , हंस को देखकर मोहित हो गया उसे उसका सफेद रंग बहुत ही ज्यादा पसंद आया

और वह अपने आप में सोचने लगा कि काश वह भी इस हंस की तरह  एकदम दूध की तरह सफेद होता है और लोग उस से  भी प्यार करते यह सोचते सोचते वह हंस के पास पहुंचा और हंस के कहने लगा तुम्हारी जिंदगी तो  कितनी अच्छी है तुम कितने सुंदर हो पूरी तरह से  दूध की तरह सफेद तब हंस बोला नहीं दोस्त मैं भी इतना सुंदर नहीं मैं पहले यही सोचता था जब तक मैंने तोते को  नहीं मिला था लेकिन तोता तो  मुझसे भी ज्यादा अच्छा होता है वह दो रंग का होता है तो कौवे  ने पूछा क्या सच में वह इतना सुन्दर होता है यह जानने के लिए वह तोते की खोजने निकल पड़ा कुछ दूर पर उसे कुछ तोते दाना चुगते हुए मिल गए कौए ने उनमे से एक से कहा की सच में भगवान ने तुम्हे कितना सुन्दर बनाया है पर इस पर तोता बोल उठा नहीं यह सच नहीं है काश मुझे भगवान् इतना सुन्दर बनाते मुझ से ज्यादा सुन्दर तो मोर है वह कई रंगों का राजा है , तब कौवे ने कहा और मै यदि मोर से मिलना चाहू तो उससे कन्हा मिल सकता हु तब तोते ने कहा अरे भाई उसकी तो चांदी है यंही बगल वाले चिड़िया घर में रहता है .. मन मर्जी खाने को मिलता है लोग की तो भीड़ लगती है उसे देखने के लिए वंही वो तुम्हे मिलेगा .. कौवा मोर से मिलने उड़ा और मन में ईस्वर (गॉड) को कोसने लगा की भगवन आप ने इस दुनिया को कितना सुन्दर बनाया है

आखिर मुझ से क्या गलती हो गई थी जो मुझे तूने एशा बनाया ......तभी वह मोर के पास पहुच जाता है और अपनी आँखों से देखता है की बहुत से लोग उसे देखने आ रहे है और उसे दाना डाल रहे है . कौवा मोर से जाकर कहता है यार तुम्हारी ज़िदगी तो बहुत ही बढ़िया है जरुर तुमने पिछले जन्म में बहुत अच्छे कार्य किये होंगे जो तुम इस जन्म में मोर बने हो ....तब मोर उसे सुनता रहा और बात ख़त्म होते होते उसकी आँखों में आंसू आ गए वह बोला नहीं बल्की मै तो यह सोचता हु की आखिर मैने कौन से दुस्पाप किये होंगे जो मुझे भगवन ने इतना सुन्दर बनाया अब यह सुन्दरता ही मेरी आजादी की बाधा बन रही है मुझे यह भोजन यह सुन्दरता कुच्छ भी नहीं चाहिए बस आजादी चाहिये ..मैने पता किया है की इस चिड़ियाघर में केवल कौवे को छोंड़ का बाकि सब चिडियों को पिंजड़ो में कैद कर रखा गया है कास भगवान् ने मुझे तुम जैशा  बनाया होता , बस इतना कहना था की कौवा से उड़ गया और भगवान से अपने कहे शब्दों के लिए माफ़ी मांगने लगा और धन्यवाद भी दिया उसकी आंखे खोलने के लिए .
निष्कर्स - "यही हमारी सब मुसीबतों की जड़ है की हम अकारण ही लोगो से अपनी तुलना करके स्वयं दुखी होते है , हमे जो भगवान  ने दिया है हम उसे नहीं देखते बल्कि हमारे पास जो नहीं है हम उसके बारे में सोच के दुखी होते है ..जो इंसान यह सोच कर जिंदगी जिए की भगवान् ने उसे बहुत कुछ दिया है क्योकि किसी के पास तो यह भी नहीं है वाही इस दुनिया का सबसे सुखी इंसान होगा ..किसी चीज को पाने की चाहत रखना और उसे पाना बुरा नहीं है बल्कि जो नहीं है उसे प्रति दुखी होना बुरा है "
इसे अपने दोस्तों में भी ज्यादा से ज्यादा शेएर करे क्या पता जो ज्ञान अभी पा रहे हो उसका 1 प्रतिसत हिशा भी किसी के पास न हो !

सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

अपनी जान बचाने के लिए धर्मराज युधिष्ठिर ने भी बोल डाले 15 असत्य ... lie

महाभारत ग्रंथ के अनुसार युधिष्ठिर को ‘धर्मराज’ बताया गया है। धर्मराज वो है जो धर्म के मार्ग पर चलता है। जो हमेशा सही का साथ दे, जो हमेशा सत्य का साथ दे, सत्य का पालन करे और सत्य ही बोले।लेकिन क्या आपको पता है कि स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर ने भी महाभारत काल में असत्य बोला था? शायद आप उनके द्वारा बोले गए एक असत्य
के बारे में जानते भी हों। लेकिन सच्चाई यह है कि उन्होंने एक नहीं, बल्कि कुल 15 असत्य बोले थे।
 कहते हैं कि गुरु द्रोण का का वध करने के लिए श्रीकृष्ण के कहने पर धर्मराज युधिष्ठिर ने एक असत्य बोला था। उन्होंने गुरु द्रोण से यह असत्य कहा था कि अश्वत्थामा मारा गया, जबकि अश्वत्थामा नाम का एक हाथी युद्ध में मारा गया था।

यह धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा बोला गया एक ऐसा असत्य है, जिसके बारे में कई लोग जानते हैं। इस असत्य को आधा सच, आधा झूठ भी कहा जाता है। लेकिन इसके अलावा भी उन्होंने 14 और असत्य बोले थे।

 महाभारत का अज्ञातवास अध्याय काफी प्रसिद्ध है। यह वह समय था जब सभी पाण्डवों को अपना राजपाट छोड़ एक वर्ष के लिए जाना पड़ा। उनके साथ द्रौपदी भी थीं।इस अज्ञातवास के दौरान वे लोग राजा विराट के यहां निवास करने पहुंचे। जब राजा विराट ने उनका परिचय बताने को कहा, तो अपनी पहचान छुपाने के लिए उस समय धर्मराज युधिष्ठिर ने कुल 7 असत्य बोले थे। अपना परिचय देते हुए युधिष्ठिर ने कहा, “मेरा नाम कनक है, मैं एक ब्राह्मण हूं। मैं वैयघरा नाम के ब्राह्मण परिवार से सम्बधित हूं। मैं धर्मराज युधिष्ठिर का मित्र हूं। मैं पाशे खेलने में बहुत कुशल हूं। मैं सुदूर एक नगर (काल्पनिक नाम) से आया हूं।“उन्होंने राजा विराट को अपने परिवार के बारे में भी असत्य जानकारी प्रदान की। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने भाईयों का परिचय देते हुए भी असत्य ही कहा।उन्होंने सभी के असत्य नाम बताए। इस तरह धर्मराज युधिष्ठिर ने 5 असत्य और बोले। नाम बताने के बाद उन्होंने कहा, कि इन लोगों से मेरा कोई नजदीकी रिश्ता नहीं है, और ये केवल मेरे परिचित है। इस प्रकार धर्मराज ने 2 असत्य और बोल दिए।अंतिम असत्य बोलते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें कई राजाओं के दरबार में काम करने का अनुभव है। महाभारत ग्रंथ में यह सारा वार्तालाप दर्ज है। राजा विराट ने उनसे क्या-क्या प्रश्न किए और स्वयं तथा अपने परिवार को बचाने के लिए उन्होंने आगे से कितने असत्य बोले, इसका उल्लेख मिलता है।  - स्लाइड शो द्वारा Gulneet Kaur



रविवार, 30 अक्टूबर 2016

छोटी दिवाली नरक चतुर्दशी क्या,क्यों और कैसे मनाते है ?

क्या:- नरक चतुर्दशी का त्योहार हर साल कार्तिक कृष्ण चतुदर्शी को मनाया जाता है। यह दीपावली के एक दिन पहले मने जाती है , चतुर्दशी तिथि को छोटी दीपावाली के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन प्रातः काल स्नान करके यम तर्पण एवं शाम के समय दीप दान का बड़ा महत्व है .
क्यों :- कारण 1 


एक हिरण्यगभ नामक एक राजा थे | उन्होंने राज पाठ छोड़कर तप में अपना जीवन व्यतीत करने का निर्णय किया |उन्होंने कई वर्षो तक तपस्या की, लेकिन उनके शरीर पर कीड़े लग गए | उनका शरीर मानों सड़ गया | हिरण्यगभ को इस बात से बहुत दुःख तब उन्होंने नारद मुनि से अपनी व्यथा कही | तब नारद मुनि ने उनसे कहा कि आप योग साधना के दौरान शरीर की स्थिती सही नहीं रखते इसलिए ऐसा परिणाम सामने आया | तब हिरण्यगभ ने इसका निवारण पूछा | तब नारद मुनि ने उनसे कहा कि कार्तिक मास कृष्ण पक्ष चतुर्दशी के दिन शरीर पर लेप लगा कर सूर्योदय से पूर्व स्नान करे साथ ही रूप के देवता श्री कृष्ण की पूजा कर उनकी आरती करे, इससे आपको पुन : अपना सौन्दर्य प्राप्त होगा |
इन्होने वही किया अपने शरीर को स्वस्थ किया | इस प्रकार इस दिन को रूप चतुर्दशी (Roop Chaudas) भी कहते हैं |इसे छोटी दिवाली भी कहा जाता हैं :यह दिन दिवाली के एक दिन पहले मनाया जाता हैं | इसमें भी दीप दान किये जाते हैं | द्वार पर दीपक लगाये जाते हैं | उतनी ही धूमधाम के साथ खुशियों के साथ घर के सभी सदस्यों के साथ त्यौहार मनाया जाता हैं | इसी कारण इसे छोटी दीवाली कहते हैं |
क्यों :- कारण 2

पुराणों की कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि को नरकासुर नाम के असुर का वध किया। नरकासुर ने 16 हजार कन्याओं को बंदी बना रखा था।
नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा कि समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया।
नरकासुर का वध और 16 हजार कन्याओं के बंधन मुक्त होने के उपलक्ष्य में नरक चतुर्दशी के दिन दीपदान की परंपरा शुरू हुई। एक अन्य मान्यता के अनुसार नरक चतुर्दशी के दिन सुबह स्नान करके यमराज की पूजा और संध्या के समय दीप दान करने से नर्क के यतनाओं और अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। इस कारण भी नरक चतु्र्दशी के दिन दीनदान और पूजा का विधान है।
कैसे :-


नरक चतुर्दशी पूजन विधि (Narak chaturdashi puja vidhi)

शनिवार, 29 अक्टूबर 2016

Ancient India : प्राचीन भारत और वैदिक संस्कृत से सम्बन्धित सामान्य ज्ञान प्रश्न ( GK Quiz )

● ‘आर्य’ शब्द का अर्थ क्या है— श्रेष्ठ या कुलीन 
● आर्यों की भाषा क्या थी— संस्कृत
● आर्यों का मुख्य व्यवसाय क्या था— पशुपालन एवं कृषि
● आर्यों ने सबसे पहले किस धातु की खोज की— लोहा 

● उत्तर वैदिक काल के वेद विरोधी व ब्राह्मण विरोधी धार्मिक अध्यापकों को क्या कहा जाता था— श्रमण 
● वैदिक गणित का महत्वपूर्ण अंग क्या है— शुल्व सूत्र 
● वेदों की संख्या कितनी है— 4 
● सबसे प्राचीन वेद कौन-सा है— ऋ​ग्वेद 
● किस वेद द्वारा वैदिक संस्कृति के बारे में ज्ञान होता है— ऋ​ग्वेद  द्वारा 
  1. Current Affairs : 2016 : में कौन क्या है ?
  2. 15 General knowledge questions for Exam ( सामान्य ज्ञान )
  3. जानिए दिवाली से जुड़ी कुछ रोचक बातें..

● भारत के राजचिन्ह में लिखा ‘सत्य-मेव-ज्यते’ किस उपनिषद से लिया गया है— मुंडक उपनिषद 
● भारतीय संगीत का आदि ग्रंथ किस वेद को कहा जाता है— सामवेद 
● प्रथम विधि निर्माता कौन है— मनु 
● ‘मनुस्मृति’ की रचना किसने की— मनु ने 
● कृष्ण भक्ति का प्रथम एवं प्रधान ग्रंथ कौन-सा है— श्रीमद्भागवत गीता 
● ऋ​ग्वेद में संपत्ति का मुख्य रूप क्या है— गो धन 
● किस मंडल में शुद्रों का उल्लेख ऋ​ग्वेद में पहली बार मिलता है— 10वें 

● पुराणों की संख्या कितनी है— 18 
● वैदिक धर्म का मुख्य लक्षण किसकी उपासना था— प्रकृति 
● किस देवता के लिए ऋ​ग्वेद में पुरंदर शब्द का प्रयोग हुआ है— इंद्र के लिए 
● ‘शुल्व सूत्र’ किस विषय से संबंधित है— ज्यामिति से 
● ‘असतो मा सद्गमय’ कहाँ से लिया गया है— ऋ​ग्वेद से 
● आर्य बाहर से आकार सर्वप्रथम कहाँ बसे थे— पंजाब में 
● ऋ​ग्वेद का कौन-सा मंडल पूर्णतः सोम को समर्पित है— नौवाँ मंडल 
● ‘दस राजाओं का प्रसिद्ध युद्ध’ दसराज युद्ध किस नदी पर हुआ था— परुणी नदी पर 
● धर्म शास्त्रों में भू-राजस्व की दर क्या है— 1/6 
● 800 ई. पू. में 600 ई. पू. का युग कौन-सा युग कहा जाता है— ब्राह्मण युग 

● प्रसिद्ध गायत्री मंत्र किस पुस्तक में है— ऋ​ग्वेद में 
● न्याय दर्शन को किसने प्रचारित किया था— गौतम ने 
● प्राचीन भारत में ‘निंक’ के नाम से किसे जाना जाता है— स्वर्ण आभूषणों को 
● योग दर्शन का प्रतिपादन किसने किया— पंतजलि 
● उपनिषद किस पर आधारित हैं— दर्शनपर 
● आरंभिक वैदिक सभ्यता में सबसे बड़ी नदी कौनसी थी— सिंधु नदी 
● कौन-सा वेद गद्य और पद्य दोनों में रचित है— यजुर्वेद 
● विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य कौन-सा है— महाभारत 
● महाभारत का दूसरा नाम क्या है— जयसंहिता 
● महाभारत के रचियता कौन हैं— देवव्यास 
● रामायण किसके द्वारा रचित है— वाल्मीकि 
● उपनिषद काल के राजा अश्वपति किस स्थान के शासक थे— केकैय 
● अध्यात्मक ज्ञान के संबंध में नचिकेता और यम का संवाद किस उपनिषद से प्राप्त होता है—कठोपनिषद् 

● वैदिक नदी ‘कुभा’ का स्थान कहाँ हैं— अफगानिस्तान में 
● कपिल मुनि द्वारा प्रतिपातिद की गई दार्शनिक प्रणाली कौन-सी है— सांख्य दर्शन 
● भारत के किस स्थल की खुदाई में लौहधातु के प्रचलन के प्रमाण मिले— अतरंजीखेड़ा 
● किस वेद का संकलन ऋ​ग्वेद पर आधारित है— सामवेद 
● कर्म का सिद्धांत किससे संबंधित है— मीमांसा से 
● ‘चरक संहिता’ किससे संबंधित है— चिकित्सा से 
● यज्ञ संबंधी विधि-विधानों का पता किस वेद से चलता है— यजुर्वेद से 

● वैदिक युग की सभा क्या कहलाती थी— मंत्री परिषद 
● कौन-सी दस्तकारी आर्यों के द्वारा व्यवहार में नहीं लाई गई थी— लुहारगिरी 
● किस देव में जादुई माया और वशीकरण का वर्णन किया गया है— अथर्ववेद 
● प्राचीन व्याकरण ग्रंथ ‘अष्टाध्यायी’ किसके द्वारा रचित है— पाणिनी 
● मनुस्मृति किससे संबंधित है— समाज व्यवस्था से

● गायत्री मंत्र की रचना किसने की— विश्वामित्र ने 
● अवेस्ता किस क्षेत्र से संबंधित है— ईरान से 
● आर्य भारत में कहाँ से आए— मध्य एशिया से 
● सैंधववासी मिठास के लिए किस वस्तु का प्रयोग करते थें— शहद का 
● सैंधव सभ्यता में कौन-सी प्रथा पचलित थी— पर्दाप्रथा व वेश्यावृत्ति 
● वैदिक काल की दो प्रसिद्ध विदुषी महिलाएं कौन थीं— अपाला व घोषा 
● ऋ​ग्वेद में ‘अघन्य’ शब्द किस पशु के लिए प्रयोग किया गया है— गाय 

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GK : गायत्री मंत्र किस पुस्तक से लिया गया है और इसका अर्थ क्या है ?

(A) ऋग्वेद
(B) सामवेद
(C) यजुर्वेद
(D) अथर्ववेद





उत्तर :- (a) ऋग्वेद

गायत्री मंत्र का अर्थ :-
"उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।"